दूसरे मुकदमे का हवाला देकर निस्तारण और ‘विनोद तिवारी’ आईडी पर कार्रवाई को लेकर सवाल
अजय कुमार गुप्ता सोशलिस्ट न्याय लखनऊ
लखनऊ अमेठी। थाना जगदीशपुर क्षेत्र के मंगौली निवासी मान्यता प्राप्त पत्रकार एवं उत्तर प्रदेश जिला मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति के प्रदेश संगठन मंत्री गंगेश पाठक ने 30 मई 2026 को “विनोद तिवारी” फेसबुक आईडी सहित “कंगन चोर”, “ग्राम पंचायत मंगौली”, “दूध का दूध पानी का पानी” तथा अन्य अज्ञात फेसबुक आईडी की पोस्ट-टिप्पणियों के स्क्रीनशॉट, लिंक और डिजिटल साक्ष्य थाना जगदीशपुर में उपलब्ध कराते हुए शिकायत की थी। उनका कहना है कि मांग किसी व्यक्ति को बिना जांच दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों की निष्पक्ष एवं वैज्ञानिक साइबर जांच कराने की थी। मूल शिकायत में मु0अ0सं0 158/2026 में दर्ज अज्ञात फेसबुक आईडी के वास्तविक संचालकों की पहचान तथा उनकी पोस्ट-टिप्पणियों में प्रयुक्त भाषा, शब्दावली, वाक्य-विन्यास और लेखन-शैली की “विनोद तिवारी” आईडी की सामग्री से तकनीकी तुलना कराने की मांग की गई थी। साथ ही उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर “विनोद तिवारी” आईडी के संबंध में नियमानुसार एफआईआर पर निर्णय लेने का अनुरोध किया गया था। 24 सितंबर 2026 की जनसुनवाई पुलिस आख्या में बताया गया कि 28 मई 2026 को मु0अ0सं0 158/2026 धारा 352, 351(2) बीएनएस एवं 66(D) आईटी एक्ट के तहत अज्ञात के विरुद्ध मुकदमा दर्ज हुआ और विवेचना निरीक्षक वीरेंद्र कुमार मिश्रा द्वारा की जा रही है। उसी आख्या में “विनोद तिवारी, सहायक समीक्षा अधिकारी, सचिवालय उत्तर प्रदेश लखनऊ” के भाई अतुल तिवारी, प्रधान प्रतिनिधि, की तहरीर पर गंगेश पाठक के विरुद्ध मु0अ0सं0 159/2026 तथा बाद में आरोप-पत्र संख्या A209 दिनांक 31 अगस्त 2026 भेजे जाने का भी उल्लेख किया गया। शिकायतकर्ता का मुख्य सवाल है कि उनकी मूल शिकायत का विषय मु0अ0सं0 159/2026 या आरोप-पत्र A209 नहीं था। प्रश्न यह था कि “विनोद तिवारी” आईडी से संबंधित उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों की तकनीकी जांच क्यों नहीं हुई, उसके वास्तविक संचालक की पहचान के लिए क्या साइबर कार्रवाई हुई और एफआईआर के संबंध में क्या निर्णय लिया गया। इसलिए दूसरे मुकदमे का उल्लेख मूल शिकायत के स्वतंत्र प्रश्नों का उत्तर नहीं हो सकता। पुलिस आख्या में यह भी कहा गया है कि मु0अ0सं0 158/2026 पहले से पंजीकृत होने के बावजूद आवेदक एक ही प्रकरण में कई अभियोग दर्ज कराना चाहता है, बार-बार आरोप-प्रत्यारोप लगाकर प्रार्थना-पत्र देता है और भविष्य में भी असंतुष्ट फीडबैक देने की संभावना है। शिकायतकर्ता का कहना है कि वह एक ही मामले में बार-बार मुकदमा दर्ज कराने की मांग नहीं कर रहा, बल्कि अलग-अलग फेसबुक आईडी, अलग पोस्ट-टिप्पणियों और उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों की स्वतंत्र तकनीकी जांच चाहता है। यदि मु0अ0सं0 158/2026 अज्ञात के विरुद्ध दर्ज है तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि अज्ञात आईडी के संचालकों की पहचान के लिए क्या कार्रवाई हुई और “विनोद तिवारी” आईडी से उनकी सामग्री की तकनीकी तुलना हुई या नहीं। शिकायतकर्ता के अनुसार भविष्य में असंतुष्ट फीडबैक की संभावना किसी शिकायत के निस्तारण का आधार नहीं होनी चाहिए। यदि साक्ष्य गलत हैं तो तकनीकी जांच में स्पष्ट किया जाए, यदि सही हैं तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो और यदि एफआईआर नहीं बनती तो उसका स्पष्ट तथ्यात्मक एवं विधिक आधार बताया जाए। उनका कहना है कि प्रमाणों की जांच के बजाय शिकायतकर्ता की संभावित प्रतिक्रिया का उल्लेख मूल प्रश्नों का समाधान नहीं है। शिकायत में “कंगन चोर” आईडी से कथित फेसबुक कॉलिंग एवं धमकी तथा “विनोद तिवारी” आईडी से उनके स्वर्गीय पिता के संबंध में की गई टिप्पणियों की भी डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर जांच की मांग की गई है। शिकायतकर्ता के अनुसार उनके पिता इन घटनाओं से तनाव में रहते थे और बाद में उनका निधन हो गया। वह इन घटनाओं के बीच कोई निष्कर्ष स्वयं नहीं निकाल रहे, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष तकनीकी जांच की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि “विनोद तिवारी” और अज्ञात आईडी के बीच कोई तकनीकी संबंध नहीं मिलता तो वह निष्कर्ष भी स्वीकार्य होगा, लेकिन यह निष्कर्ष जांच के बाद ही सामने आ सकता है। यदि किसी आईडी का संचालन किसी व्यक्ति से जुड़ा पाया जाता है अथवा अपराध के पर्याप्त तथ्य मिलते हैं तो विधि के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। शिकायतकर्ता ने कहा कि पुलिस आख्या तैयार करने में लगाया गया समय और प्रयास यदि उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों की तकनीकी जांच में लगाया जाता तो विवाद के वास्तविक तथ्यों की स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती थी। उनका उद्देश्य किसी अधिकारी को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि यह जानना है कि उनके द्वारा दिए गए प्रमाणों पर वास्तव में जांच हुई या नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि किसी अधिकारी द्वारा किसी व्यक्ति को बचाने या दबाव में काम करने का निष्कर्ष बिना जांच के नहीं निकाला जा सकता। इसलिए ऐसी आशंका की भी वरिष्ठ स्तर से निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। यदि जांच में कोई तथ्य नहीं मिलता तो उसे लिखित रूप में स्पष्ट किया जाए, लेकिन जांच किए बिना शिकायतकर्ता की नीयत, असंतुष्टि या भविष्य के फीडबैक को आधार बनाकर शिकायत समाप्त न की जाए। शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि एक नागरिक स्क्रीनशॉट, लिंक और अन्य प्रमाण उपलब्ध करा रहा है तथा जांच में सहयोग के लिए तैयार है, तो उसकी बात सुनी जानी चाहिए। उनका सवाल है कि क्या आर्थिक या प्रभावशाली स्थिति के आधार पर किसी नागरिक की शिकायत की गंभीरता तय होनी चाहिए। उनका कहना है कि वे किसी विशेष सुविधा, धन या अनुचित लाभ की मांग नहीं कर रहे, बल्कि अपने द्वारा दिए गए प्रमाणों की जांच और कानून के अनुसार निर्णय चाहते हैं। उनके अनुसार यदि प्रमाणों के बावजूद केवल औपचारिक रिपोर्ट लगाकर शिकायत बंद की जाती है तो इससे आम नागरिक के विश्वास और शासन-प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं। उन्होंने उच्च अधिकारियों से मांग की है कि 30 मई 2026 की मूल शिकायत और सभी डिजिटल साक्ष्यों की स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए, मु0अ0सं0 158/2026 की अज्ञात आईडी के वास्तविक संचालकों की पहचान के लिए की गई साइबर कार्रवाई स्पष्ट की जाए, “विनोद तिवारी” सहित संबंधित आईडी की भाषा, शब्दावली, वाक्य-विन्यास, लेखन-शैली और अन्य डिजिटल संकेतों का तकनीकी तुलनात्मक परीक्षण कराया जाए तथा “कंगन चोर” आईडी से कथित फेसबुक कॉलिंग/धमकी और स्वर्गीय पिता से संबंधित टिप्पणियों की भी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जांच की जाए। उनकी मांग है कि जांच में संज्ञेय अपराध के पर्याप्त तथ्य मिलने पर विधि के अनुसार एफआईआर और कार्रवाई की जाए। यदि एफआईआर दर्ज नहीं की जाती तो उसके स्पष्ट तथ्यात्मक एवं विधिक कारण लिखित रूप में बताए जाएं। उनका कहना है कि मु0अ0सं0 159/2026 अथवा आरोप-पत्र A209 का उल्लेख उनकी स्वतंत्र शिकायत के तकनीकी प्रश्नों का उत्तर मानकर निस्तारण का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। मामले में मुख्य प्रश्न यही है कि उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों की वास्तविक तकनीकी जांच हुई या नहीं, हुई तो उसका निष्कर्ष क्या है, अज्ञात आईडी के संचालकों की पहचान के लिए क्या कार्रवाई हुई और “विनोद तिवारी” आईडी के संबंध में एफआईआर दर्ज करने अथवा न करने का विधिक आधार क्या है। शिकायतकर्ता के अनुसार इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर ही वास्तविक और निष्पक्ष निस्तारण सुनिश्चित कर सकता है। उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों से अपेक्षा की है कि केवल खानापूर्ति के लिए रिपोर्ट लगाने के बजाय उपलब्ध प्रमाणों की जांच कराई जाए और जो तथ्य सामने आएं, उनके आधार पर समान रूप से कानून के अनुसार निर्णय लिया जाए।