पसमांदा मुस्लिम समाज के अध्यक्ष अनीस मंसूरी का बयान: 'सुप्रीम कोर्ट का वादा झूठा साबित हुआ
लखनऊ। पसमांदा मुस्लिम समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मंत्री अनीस मंसूरी ने देश की न्याय प्रणाली और सांप्रदायिक माहौल को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अयोध्या का मुद्दा केवल एक अपवाद रहने का भारत की सुप्रीम कोर्ट ने मुसलमानों से वादा किया था, लेकिन अब ऐसा लगता है कि यह वादा केवल एक झूठ था। मंसूरी ने अपने बयान में कहा कि न्यायालयों के फैसले सांप्रदायिक शक्तियों को हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग ढूंढने का अवसर दे रहे हैं, जो देश की एकता और अखंडता के लिए खतरनाक है।
'संघी अदालतें' देश के माहौल को कर रही हैं खराब
मंसूरी ने कहा कि कुछ शक्तियां न्यायपालिका को अपने राजनीतिक और सांप्रदायिक एजेंडे का साधन बना रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि "संघी अदालतें" अब हर ऐतिहासिक मस्जिद को विवादित बनाने की ओर बढ़ रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की प्रवृत्ति से न केवल मुसलमानों के विश्वास को ठेस पहुंच रही है, बल्कि भारत की न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर भी सवाल उठ रहे हैं।'अयोध्या सिर्फ़ एक अपवाद रहेगा' का वादा टूटा
पूर्व मंत्री ने कहा कि अयोध्या विवाद का समाधान होने के बाद मुसलमानों को भरोसा दिलाया गया था कि यह मामला एक अपवाद होगा और अन्य धार्मिक स्थलों को लेकर कोई विवाद नहीं उठेगा। लेकिन अब वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद और अन्य धार्मिक स्थलों को लेकर विवाद खड़ा करना इस वादे के खिलाफ है।देश में बढ़ती सांप्रदायिकता पर चिंता मंसूरी ने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह की घटनाएं देश को बांटने का काम कर रही हैं। उन्होंने कहा, “भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब और सांप्रदायिक सद्भाव को बचाने के लिए ज़रूरी है कि ऐसे विवादों पर लगाम लगाई जाए। संविधान और न्यायालयों का उद्देश्य सबके लिए समान न्याय और शांति सुनिश्चित करना है, न कि किसी एक वर्ग के हितों को बढ़ावा देना।”मुसलमानों से की एकजुटता की अपील अनीस मंसूरी ने मुसलमानों से भी अपील की कि वे इन परिस्थितियों में संयम और एकता बनाए रखें। उन्होंने कहा कि पसमांदा मुस्लिम समाज देश के संविधान में पूरा विश्वास रखता है और किसी भी तरह की सांप्रदायिकता का विरोध करता रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट पर उठे सवाल मंसूरी ने सुप्रीम कोर्ट से भी अपील की कि वह अपने फैसलों में संविधान की मूल भावना का पालन करे और ऐसे किसी भी प्रयास को रोके जिससे देश में सांप्रदायिकता को बढ़ावा मिले। अनीस मंसूरी ने कहा कि न्यायलय के इस तरह के फैसलों से जनता का विश्वास उठता जा रहा है जैसे बाबरी मस्जिद के मामले में 5 जजों की बेंच ने अपने फैसले में स्वीकारा कि बाबरी मस्जिद थी इस के बावजूद आस्था के आधार पर फैसला आया तो कहीं न कहीं न्यायलय के जज भी राजनीति से प्रेरित थे जिन्हें समय रहते कुछ न कुछ राजनैतिक लाभ मिला है